तरुण व्यास ने सीज़न्स ग्रीटिंग्स की समीक्षा की।

सीज़न्स  ग्रीटिंग्स की समीक्षा: ख़ामोशी, तन्हाइयो और चुपियो को तोड़ने वाली फिल्म

फिल्म समीक्षा से पहले मैं निर्देशक राम कमल मुख़र्जी को एक शानदार विषय  पर ४३ मिनट की फिल्म बनाने का शुक्रिया करता हु साथ ही उनके लिखे स्क्रीन प्ले के लिए आभार प्रस्तुत करता हूँ ये कोई दोस्ती के नाते नहीं ये एक दर्शक के नाते में कह रहा हु बहरहाल फिल्म पर आते है जिसका नाम है सीज़न्स ग्रीटिंग्स

बंगाल की पृष्ठ भूमि लिए ये फिल्म पारिवारिक रिश्तो के द्वन्द और चाहत को बयां करती है ये फिल्म ज़िन्दगी के हर मौसम(उम्र)  देख रहे और देख चुके लोगो के लिए है
ये फिल्म आज के ज़माने की फिल्म है जो पुराने ज़माने के रीती रिवाज़ो को बिना छेड़े नए ज़माने की जीवन जीने की शैली को
अपनाती है, संगीतकार शैलेन्द्र का बांग्ला म्यूजिक और गायन का प्रयोग इस फिल्म के दृश्यों को और मुखाग्र बनाता है,

फिल्म की शुरुवात में थोड़ी बोल्ड दृश्य है जो की कहानी की मांग है क्योकि आजकल का दौर लिविंग रिलेशनशिप का है जहाँ पर अपनी मर्ज़ी से एक लड़का- लड़की बिना शादी किये एक ही घर में पति पत्नी की तरह ज़िन्दगी जीना पसद करते है, एक लड़की रोमिता (सेलिना जेटली) है जो अपने बॉय फ्रेंड उस्मान खान  के साथ रहती है, रोमिता हिन्दू और उस्मान एक मुस्लमान है पर दोनों एक दूसरे को बेहद चाहते है लड़की शादी के बाद नाम नहीं बदलना चाहती और लड़का फेरे और निकाह में समानता को मानता है और साथ ही अपने अम्मी अब्बू को बहुत सम्मान देता है उनकी परवाह करता है
रोमिता की माँ सुचारिता है जो  १५ साल से अपने पति से अलग रहती है पर दोनों ने तलाक नहीं लिया फिल्म से सीख  मिलती है कि रिश्ते तोडना सही नहीं है अगर मन नहीं मिलते तो अलग रहा जा सकता है रोमिता की माँ ईमेल के ज़माने में भावनात्मक पत्रों से दिल के अरमान बयां करती है और कई लेटर्स लिख कर बेटी को भेजती है  उधर रोमिता अपने प्रेमी उस्मान खान को अपनी माँ से मिलवाना चाहती है  करीब २ साल के बाद अपनी माँ से मिलवाने उसके बंगले (उत्सव)  जा रही है

जिसके बंगले का नाम उत्सव है लेकिन ज़िन्दगी हर पल एक शमशान सी ख़ामोशी वाली है, अकेलापन किस तरह इंसान की ज़िन्दगी में एक ज़हर होता है ये अकेला रहने वाला ही समझ  पाता है फिल्म समझाती है कि एक उम्र हो जाने के बाद बिन साथी के ज़िन्दगी काटना ज़िंदा लाश सा है जिसकी न तो कोई इच्छा होता है न ही जीने को प्रेरित करने वाली चाह !

आजकल कि युवा पीढ़ी खुद के लिए हर तरीके से आज़ादी चाहती है लेकिन अपने माता पिता को वो रीती रिवाज़ में ही देखना पसंद करती है  राम कमल मुख़र्जी ने  इस अजीब विडम्बना को बहुत प्रभावशाली तरीके से दर्शाया  है रोमिता अपनी माँ से सिर्फ दिखावे का सा प्यार करती नज़र आती है और पिता के जाने का दोष सुचरिता के गाने और डांस को देती है पर अपने पिता को कभी गलत नहीं बताती दूसरी तरफ उस्मान अपने माँ और पिता से बेहद प्यार करता है जैसा है वैसा ही दर्शाता है

फिल्म के एक दृश्य में शिखंडी शीर्षक नामक किताब के माध्यम से समाज के तीसरे वर्ग (किन्नर समाज ) को भी समाज में स्थान दिलाने की बात समझ आती है

क्लाइमेक्स बड़ा ही रोचक और रोमांचित कर देने वाला  है इसके लिए zee5 पर इस फिल्म को कभी भी देखा जा सकता है

फिल्म अपने  डायलाग के माध्यम से हर उम्र के दर्शक को सोचने समझने पर मजबूर कर देती है कही पर  आज की ऑनलाइन सोशल नेटवर्किंग वाली पीढ़ी की कमज़ोरी और पुराने वक़्त के लोगो की तथा कथित मजबूरी को बताती है हर दर्शक अपने आपको  फिल्म से भावनात्मक जुड़ा पता है और उसके कई सवाल और उनके जवाब वह खुद निकाल सकता है

उस्मान कहता है  आजकल लोग अपनी फेसबुक की टाइम लाइन पर ही दम तोड़ देते है ! दूर  से मुद्दों को इसलिए
सपोर्ट करते है की अपनी कमज़ोरी छिपा सके और हीरो बनने का मौका भी मिल जायेगा ( वास्तव में ये आज के युग की सच्चाई है

साथ ही स्त्री पुरुष के खोने पाने की बात को पौराणिक महाकाव्य रामायण के चरित्र सीता से जोड़ कर कहा की आग में जलना पड़ा सीता को और पुरुषोत्तम की उपाधि किसी और को मिली l

डिस्टेंस रिलेशनशिप में दूर से प्यार जताना और क़द्र करना ये सब  रिश्ते  न निभाने सकने का सिर्फ एक बहाना होता है

वही अभिनेत्री लिलेट दुबे ने पुराने नुस्खे का हवाला देते हुए कहा की सरसो को पत्थर पर पीसना वार्ना स्वाद नहीं आता
दूसरी और वो नए कानून धारा सेक्शन ३७७ का हवाला देती हुई अपनी तन्हाइयो को किसी का साथ दिलवाने का शुक्रिया सा अदा करती है l

सार – अंत में ये ही कहना चाहुगा की ये फिल्म ख़ामोशी, तन्हाइयो और चुपियो को तोड़ने वाली फिल्म है इंसानो से समाज बनता है समाज से इंसान नहीं , हर किसी को अपनी ज़िन्दगी अपने तरीके से जीने की आज़ादी है और उस पर जब सुप्रीम कोर्ट की मोहोर लग गई इस उमड़ती भीड़ में  भला कोई अकेला क्यों रहे  ल

समीक्षक: तरुण व्यास (अभिनेता और समीक्षक)
रेटिंग: **** ½

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